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बसंती मतवाली 4

सुनीता की सब सहेलिया चली गई थी , बस मैं और सुनीता ही बचे थे। सुनीता मेरी और देख कर बोली कल से तुमको शाम के समय मोना के यहाँ भी जाना हैं। यहाँ तुम दोपहर का खाना बना के चली जाना। वह मोना के बेटे की देखभाल करना और याद रहे खूब अच्छे तरीके से औरत की एक्टिंग करना किसी को भी शक नहीं होना चाहिए की तुम औरत नहीं हो। और हाँ साड़ी को अच्छे से बांधना पल्लू सीने से नीचे नहीं गिरना चाहिए ,सिलिकॉन के बूब्स लगा रखे हैं तुमने। मर्द तो नहीं जान सकते की ये असली हैं या नहीं पर औरतो से तुमको सावधान रहना होगा। उनको पता लगते देर नहीं लगेगी। की तुम औरत नहीं मर्द हो। इसलिए बहार की किसी भी औरत के सामने अपने सर पे हमेशा पल्लू रखना। जी ठीक है मैं समझ गया। क्या बोलै मैं समझ गया। अब तुम एक औरत हो घर में चाहे कोई दूसरा हो या न हो। तुम हमेशा औरत ही बात करोगी। समझी – सुनीता ने कड़क आवाज़ में कहा। जी मैं समझ गई की मैं अब पूरी औरत बन चुकी हु इसलिए मर्दो किकोई भी हरकत नहीं करनी हैं। इस बात का आगे से ध्यान रखूंगी।

सुनीता बेड पे सो गई , मैं भी अपने कमरे में सो गई थी। अब सुनीता मेरे साथ नहीं सोती थी। उसका बीएड रूम अलग था उसमे ढेर सारे फोटो लगे थे इन फोटोज में लड़कियों ने paint शर्ट टाई belt कोट पहने हुए थे। मेरा bedroom रूम अलग था इसमें ऐसी फोटो लगी थी जिसमे मर्दो ने साड़ी ब्लाउज पेटीकोट पहना हुआ था। सुनीता मुझे ऐसी मूवी और गाने सुनती थी जिसमे मर्द औरत बन के नाचते थे। कुल मिला के वो मेरा ब्रेन वाश कर रही थी और मुझे मानसिक रूप से पूरी तरह औरत बना रही थी। इसका असर बनी मेरे ऊपर होने लगा था। मुझे अब औरत के कपडे और मेकअप अच्छे लगने लगे थे। खैर रत अच्छे से बीत गई। मैंने अपना रूटीन वर्क किया और सुनीता को ऑफिस भेज दिया फिर दोपहर का खाना बनाया और काम ख़त्म करके मोना के यहाँ चली गई। मोना ने दरवाज़ा खोला और बोली बाई तुम आ गई मैं तो कब से तुम्हआरा इंतज़ार कर रही थी। लो मुन्ना बस तुम्हारा ही इंतज़ार क्र रहा है। मैंने मुन्ने को गोदी में उठा लिया और वो भी कम्भख्त मेरी गॉड में ऐसे खेलने लगा जैसे मई ही उसकी मम्मी हु. ये देख के मोना बोली -बसंती अब तुम इसको देखो मैं तो चली सोने। मोना बैडरूम में सोने गई और मैं मुन्ने के साथ बिजी हो गई।

समय अपनी चाल से चल रहा था मैं भी इस कदर कामो में बास्त हो चुकी थी की शायद अब मैं अब ये भूल चुकी थी की मैं एक मर्द थी कभी , मेरे बल अब कमर तक हो चुके थे अब मुझे विग की कोई जरूरत नहीं थी नक् कण चीड़वनी की वजह से मैं पूरी औरत लगती थी अब मुझे मेकअप करना आ गया था जब तक मैं दो से तीन बार दिन में सज न लू खुद मुझे अजीब सा लगता था। मेरे होठों की लाली कभी हलकी नहीं पड़ती थी। जब भी कोई त्यौहार पड़ता था तो मैं पूरी तरह दुल्हन की तरह सज जाती थी। सुनीता ने जो हार्मोन मुझे दिए थे उससे मेरा पेनिस अब नाम मात्रा का हो गया उसमे कभी तनाव नहीं आता था। मेरा पूरा सरीर चिकना आवाज़ नेचुरल रूप से अब पतली हो गई थी। मैं अपना काम कर रही थी दिन में घर का काम करने के बाद मोना के घर चली जाती थी। पति कैलाश बहुत ही हैंडसम थे पता नहीं जब भी वो मेरे तो मेरे उप्पेर एक अजीब सा जादू हो जाता था। मई उनके सरीर को बस देखती रह जाती थी। मैं अक्सर सोचने लगती थी की अगर मैं एक सचमुच की औरत होती तो ऐसे ही हस्बैंड से शादी करती। पता नहीं मेरे अंदर एक रियल औरत क्यों जाग रही थी। आखिर कर मेरा मन एक औरत के अनुसार क्यों रियेक्ट कर रहा था , ये मेरे लिए एक नयी चीज़ थी.

.मैं अपने काम में बिजी थी या यु बोलू की अपनी नयी जिंदगी को अब मन से जीने लगी थी। इसी का नतीजा था की मेरे मन में अब एक औरत वाली फीलिंग आने लगी थी। मई इसी वजह से मोना के कैलाश को देखकर अजीब से खयालो में गुँम हो जाती थी। पर मैं अभी इन सब भावनाओ में इतनी नहीं खो गई थी की सेक्स करने के लिए आतुर हो जाऊ. एक दिन मोना की तबियत कुछ ख़राब हो गई उसकी सिस्टर गौण से आ गई थी। मोना ने सुनीता को बोलै की बसंती को एक दो दिन मेरे यहाँ ही रहने दो रत में। क्युकी मेरा बच्चा बहुत ही छोटा है और वो बस बसंती के पास ही खेलता है। सुनीता मन गई। मुझे रत में मोना के पास ही रुकना पड़ा ,मैंने खाना बना कर कैलाश जी को दे दिया था और सुनीता के पास भी खाना भिजवा दिया था। मैं अब मोना के बेटे के पास ही लेती थी मोना की तबियत ठीक न होने की वजह से मेरे उप्पेर बहुत लोड पड़ रहा था। मैं भी सोने की तैयारी क्र रही थी मोना का बच्चा भी सो गया था। अचानक डोर बेल्ल बज उठी। मैं चौक पड़ी इतनी रत को कौन हो सकता है। पर दूर बेल्ल लगातार बज रही थी मजबूर होकर दरवाजा खोलना पड़ा। दरवाज़ा खोलते ही मैं चौक पड़ी। ……..

सामने कैलाश जी खड़े थे। पल्लू अपने सीने पे सही करते हुए मैंने बस इतना कहा आप और इस समय। सब ठीक तो हैं न। मोना जी ठीक हैं न। ……

मोना जी कैसी है और इस समय आप यहाँ पे। मैं बिलकुल ही सोच नहीं प् रही थी की कैलाश जी इस समय यहाँ क्यों आ गए है। बिना कुछ कहे ही कैलाश जी अंदर आ गए और सीधा ही बाथ रूम में चले गए , वह से निकले तो उन्होंने केवल लोअर पहन रखा था। इतना बोले की खाना लगा दो। मैं खाना गरम करने लगी। मोना का बच्चा सो रहा था। मैंने उसकी बगल में एक तकिया लगा दिया था। मैं खाना लेकर कैलाश जी के पास गई तो उन्होंने मुझे एक पैकेट दिया बोले ये मंदिर का प्रसाद ही खा लो. मैंने प्रसाद खा लिया पर प्रसाद कहते ही मुझे सर में कुछ अजीब सा लगा और मैं व्ही सोफे पे बैठ गई. मैं बैठे बैठे देख रही थी कैलाश ने खाना खाया और खुद ही बर्तन किचन में ले गए। उन्होंने मुझे पकड़ के बीएड पे लिटा दिया और मेरी बगल में ही लेट गए। बच्चा दूसरे रूम में सो रहा था , वाइए भी वो रात में नहीं उठता था। 

 

 

मैं कुछ करने की हालत में नहीं थी मैंने देखा की कैलाश जी ने मेरे सीने पे से पल्लू हटा दिया , और मेरे ब्लाउज के दो हुक खोल के अपना हाथ अंदर डाल दिया, ये क्या कर रहे हो आप , मोना जी बीमर है और आप मेरे साथ ये सब। कैलाश जी पर बातून का कोई असर ही नहीं हो रहा था , उन्होंने अपने होठ मेरे होठो पे रख दिए और मुझे जोर जोर से चूमने लगे. पता नहीं क्यों मैं अब कोई विरोध नहीं कर पा रही थी मेरी वाइफ के दिए हॉर्मोन अब अपना असर दिखा रहे थे मैं पूरी तरह एक औरत महसूस कर रही थी , मैंने अपने शरीर को ढीला छोड़ दिया और कैलाश जी की हरकतों को एन्जॉय करने लगी. वो भी अपने आप को कण्ट्रोल नहीं कर पा रहे थे। उन्होंने अपने हाथ मेरे पेटीकोट की और बढ़ा दिए और एक झटके में मेरे पेटीकोट का नारा खोल दिया। कुछ ही देर में हम दोनों एक हो गए थे। मं बिस्टेर पर लेटी थी कैलाश जी ने दुसरे कमरे से बच्चे को लेकर मेरे पास सुला दिया ,बच्चे के हाथ मेरे सिलिकान बूब्स पर पड़े जो कैलाश के ब्लाउज का हुक खोलने की वजह से खुले थे , उसने बूब्स को मुँह मी लेकर चूसना सुरु कर दिया। मैं ये सब देख के खुद ही शर्मा गई , मैंने देखा कैलाश जी भी व्ही बगल में लेटकर मुस्करा रहे थे।

अब तो ये रोज की बात हो गई थी मोना जी हॉस्पिटल में थी और मेरी वाइफ अपने घर में। मैं मोना के घर की नौकरानी से धीरे धीरे उसकी सौतन बन रही थी। मैं अब यही से अपनी वाइफ के लिए खाना भेज देती थी. पहले मैं दुआ कर रही थी की मोना जल्दी ठीक हो के घर वापस आ जाये और मैं अपने घर चली जाऊ. पर अब मैं ये सोचने लगी थी की मोना जी कुछ दिन और रहे हॉस्पिटल में ताकि मैं कैलाश जी के साथ अपनी राते बिता सकू. ऐसा करते हुए दस दिन हो गए थे , मेरी वाइफ अब कहने लगी थी की कब आ रही हो , मैं कह देती मोना जी के आने के बाद ही आउंगी। इस बार वो कह देती है अब तो तुम मोना की ही नौकरानी हो पर यद् रखना तुम एक मर्द हो जिसको मैंने मेकअप और हार्मोन देव् के औरत बनाया ही अगर तुम्हारी पोल खुल गई तो कही की नहीं रहोगी. मेरी बीवी को ये शायद पता नहीं था की कैलाश जी को अब ये सब पता चल की मैं एक क्रॉसड्रेस्सेर हु उन्होंने मेरा बहुत छोटा पेनिस देखा है और इसके बावजूद मेरे को एक औरत की तरह भोगा हैं। उनका दिया हुआ दर्द मेरे लिए प्यार का तोहफा है जिसका कोई मोल नहीं हैं। सच तो ये है की मुझे मर्द औरत बनाने का पूरा श्रेया कैलाश जिं को ही हैं। मैं अब हर रात कैलाश जी के साथ ही बिताना चाहती थी , मुझे अब वाइफ की भीं यद् नहीं आती थी क्युकी उसने मुझे मर्द से औरत बनाने की जो कोशिश की थी वो अब मेरे लिए सबसे बड़ा सकूं बन गई थी , वो मुझे एक नाकारा समझ के नौकरानी बना के घर में रखना चाहती थी ,अब यही औरत का रूप मेरी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई थी. मोना जी २१ वे दिन वापस आ गई , मैं उनके आने से खुश होने के बजाय उदास हो गई थी। क्युकी अब मुझे घर जाना पड़ेगा। मैं शायद अब कैलाश जी के बिना नहीं रह सकती थी। मेरी वाइफ भी शाम को मुझे लेने मोना जी के यहाँ आ गई। मन मारकर ही सही मुझे वाइफ के साथ जाना पड़ा मेरे चेहरे पे कोई ख़ुशी नहीं थी। मैंने कैलाश जी की तरफ देखा वो मुँह दूरसी तरफ करके खड़े थे। मैं वाइफ के आठ अपने घर आ चुकी थी। वोह बोली क्या हुआ , तुम इतनी उदास क्यों हो , लगता ही मैं तुमको ससुराल से विदा करा के ले चल रही हु। बिना पति के तुम रह नहीं सकोगी. मैं कुछ बोल नहीं सकीय ऐसा लगा जैसे मेरी चोरी पकड़ी गई हैं। 



 

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मेरा नाम बसंत है, और मेरी उम्र 25 साल है। मैं कानपूर में रहता हूं। मैं शादीशुदा आदमी हूं, और मेरी पत्नी का नाम सुनीता है,और उसकी उम्र 23 साल है। मैं ज्यादा पढ़ा लिखा नही था,बस किसी तरह से बीएससी पास था ,पर मैं टाइपिंग जनता था , इसलिए मैं एक प्राइवेट सेक्टर में छोटी सी जॉब करता था। मैं और सुनीता एक ही बिरादरी के थे, इसलिए सुनीता के पापा ने सुनीता कीशादी मेरे साथ करा दी थी।सुनीता मेरे से काफी ज्यादा पढ़ी लिखी थी, लेकिन वो कोई जॉब नहीं करती थी,या यु कहो की मैंने कभी उसे जॉब की परमिशन नहीं दी थी। लेकिन शादी के एक साल बाद सुनीता की किस्मत ने उसका साथ दिया, और सुनीता की बड़ी कम्पनी मैं नोकरी लग गई। सुनीता को अपनी सासु मां की हर बात पर टोकने को आदत पसंद नही थी, इसलिए उसने नोकरी लगने के कुछ महीने बाद ही अपने पैसों से एक नया घर खरीद लिया था। सुनीता की सैलरी मेरी सैलरी से बहुत ज्यादा थी। लेकिन सुनीता ज्यादातर अपनी सैलरी पार्टियों में, और मौज मस्ती में खर्च कर देती थी। और मेरे मना करने पर वो मुझसे लड़ने लगती थी, और कहती कि जब मैं खुद से पैसे कमाती हूं, तभी खर्च करती हूं, मैं तुमसे तो कोई पैसा नही...

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